भारत अब सिर्फ रिन्यूएबल एनर्जी से बिजली बनाने तक सीमित नहीं रहना चाहता, बल्कि उससे जुड़े उपकरणों के निर्माण में भी अपनी मौजूदगी दर्ज कराने की तैयारी कर रहा है। सोलर पैनल और विंड टर्बाइन जैसे उपकरणों के घरेलू उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए सरकार प्रोत्साहन नीति में बदलाव करने जा रही है।
सोलर और विंड टेक्नोलॉजी पर फोकस
नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय (MNRE) ने साफ किया है कि भारत अब सोलर पैनल, विंड टर्बाइन ब्लेड्स और अन्य उपकरणों के निर्माण को तेज़ करना चाहता है। इसका मकसद है 2030 तक वैश्विक विंड एनर्जी मार्केट में 10% हिस्सेदारी हासिल करना। फिलहाल इस मार्केट पर चीन का दबदबा है, लेकिन भारत अब इस स्थिति को बदलने की दिशा में कदम बढ़ा चुका है।
चीन-अमेरिका से अलग रास्ता
अभी तक सोलर पैनल निर्माण में भारत ने अच्छी प्रगति की है। 2024 में भारत ने करीब 2 अरब डॉलर के सोलर PV मॉड्यूल्स का निर्यात किया, जो 2022 के मुकाबले 23 गुना ज्यादा है। हालांकि चीन का निर्यात 60 अरब डॉलर से ऊपर है, लेकिन भारत की ग्रोथ रफ्तार उम्मीद जगाती है।
यूरोप और अमेरिका में निर्माण लागत ज्यादा है, और वहां की कंपनियां चीन पर निर्भरता कम करना चाहती हैं। ऐसे में भारत एक वैकल्पिक और सस्ता विकल्प बनकर उभर रहा है।
अमेरिकी बाजार में भारतीय कंपनियों की एंट्री
भारत की कुछ कंपनियों ने अमेरिकी सोलर मार्केट में अपनी जगह बना ली है। अब सरकार की नजर विंड एनर्जी सेक्टर पर है, जिसका मौजूदा आकार करीब 100 अरब डॉलर है और 2030 तक इसके 142 अरब डॉलर तक पहुंचने की उम्मीद है। MNRE का लक्ष्य है कि भारत इस बाजार का 10% हिस्सा हासिल करे।
आत्मनिर्भरता की ओर एक और कदम
सरकार की यह रणनीति सिर्फ निर्यात बढ़ाने तक सीमित नहीं है। इसका एक बड़ा मकसद है आयात पर निर्भरता कम करना और देश को गैर-जीवाश्म ईंधन क्षमता में आत्मनिर्भर बनाना। चीन की मौजूदा स्थिति भारत के लिए चुनौती भी है और अवसर भी।
निष्कर्ष
भारत की यह पहल न सिर्फ रिन्यूएबल टेक्नोलॉजी में उसकी पकड़ मजबूत करेगी, बल्कि वैश्विक स्तर पर उसे एक अहम खिलाड़ी भी बना सकती है। अगर योजनाएं सही दिशा में आगे बढ़ती हैं, तो आने वाले वर्षों में भारत सोलर और विंड एनर्जी उपकरणों के निर्माण में एक भरोसेमंद नाम बन सकता है।

