ऑटो डेस्क। Toyota Fortuner भारत में एक ऐसी SUV है जिसे हर उम्र के लोग पसंद करते हैं। चाहे शहर की सड़कों पर चलाना हो या पहाड़ी इलाकों में ऑफ-रोडिंग करनी हो, Fortuner ने खुद को एक भरोसेमंद विकल्प के रूप में साबित किया है। लेकिन यही गाड़ी ऑस्ट्रेलिया में अपनी पकड़ खोती जा रही है। कंपनी ने 2026 तक वहां इसकी बिक्री बंद करने का फैसला लिया है। आइए समझते हैं कि ऐसा क्यों हो रहा है।
भारत में Fortuner क्यों बनी लोगों की पसंद?
Fortuner की लोकप्रियता भारत में कई वजहों से है। सबसे पहले इसका शक्तिशाली 2.8 लीटर टर्बो डीजल इंजन, जो लंबी दूरी और कठिन रास्तों पर भी भरोसेमंद परफॉर्मेंस देता है। इसके अलावा, इसका मस्कुलर डिजाइन, ऊंचा ग्राउंड क्लीयरेंस और सॉलिड रोड प्रेजेंस इसे एक प्रीमियम SUV का दर्जा दिलाते हैं।
इसके इंटीरियर में मिलने वाला आरामदायक केबिन, स्पेस और सेफ्टी फीचर्स भी ग्राहकों को आकर्षित करते हैं। भारत में Fortuner को एक स्टेटस सिंबल के रूप में भी देखा जाता है, खासकर उन लोगों के बीच जो बड़ी और मजबूत गाड़ियों को पसंद करते हैं।
ऑस्ट्रेलिया में क्यों घट रही है Fortuner की मांग?
ऑस्ट्रेलिया में Fortuner की बिक्री लगातार गिर रही है। वहां के ग्राहक अब Ford Everest, Isuzu MU-X और यहां तक कि Toyota Hilux जैसे विकल्पों को ज्यादा पसंद कर रहे हैं। Fortuner की तुलना में ये गाड़ियां ज्यादा फीचर-पैक्ड, अधिक किफायती और लोकल जरूरतों के हिसाब से बेहतर मानी जाती हैं।
2025 के पहले 10 महीनों में Fortuner की ऑस्ट्रेलिया में सिर्फ 2,928 यूनिट्स बिकीं, जबकि Ford Everest की 21,915 यूनिट्स और Isuzu MU-X की 12,499 यूनिट्स की बिक्री हुई। Toyota की ही Land Cruiser ने 23,298 यूनिट्स बेचकर Fortuner से कहीं बेहतर प्रदर्शन किया।
बाजार की प्राथमिकताएं बदलती हैं
भारत और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में ग्राहकों की जरूरतें और पसंद अलग होती हैं। भारत में Fortuner को एक मल्टी-परपज़ SUV के रूप में देखा जाता है, जबकि ऑस्ट्रेलिया में लोग ट्रक-बेस्ड या ज्यादा वर्सेटाइल SUV को प्राथमिकता देते हैं। यही वजह है कि Fortuner वहां अपनी जगह नहीं बना पाई।
निष्कर्ष
Toyota Fortuner भारत में आज भी एक मजबूत पहचान रखती है। इसकी बिक्री लगातार बनी हुई है और नए वेरिएंट्स के साथ यह और भी आकर्षक हो रही है। वहीं ऑस्ट्रेलिया में इसका सफर धीरे-धीरे खत्म हो रहा है। यह फर्क बताता है कि हर बाजार की अपनी अलग सोच और जरूरतें होती हैं, और कंपनियों को उसी के अनुसार रणनीति बनानी पड़ती है।

