सहारा समूह की संपत्तियों को अदाणी ग्रुप को बेचने की अनुमति को लेकर सुप्रीम कोर्ट में सोमवार को अहम सुनवाई हुई। कोर्ट ने इस मामले में केंद्र सरकार से स्पष्ट जवाब मांगा है। साथ ही सहकारिता मंत्रालय को भी पक्षकार बनाने का निर्देश दिया गया है ताकि सभी संबंधित पक्षों की राय सामने आ सके।
सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि निवेशकों के हित सर्वोपरि हैं और कोई भी फैसला उनकी सुरक्षा को ध्यान में रखकर ही लिया जाएगा। कोर्ट ने न्यायमित्र (Amicus Curiae) शेखर नफाड़े द्वारा प्रस्तुत नोट पर भी केंद्र से जवाब मांगा है। इस नोट में बताया गया है कि सहारा की 88 संपत्तियों में से 34 को लेकर आपत्तियां दर्ज की गई हैं।
नफाड़े ने कोर्ट को जानकारी दी कि कुछ संपत्तियां जाली दस्तावेजों के आधार पर बेची या पट्टे पर दी गई हैं। इस पर सहारा समूह की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने कहा कि वे इन आपत्तियों पर विस्तृत प्रतिक्रिया देना चाहते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि दस्तावेजों की वैधता की जांच जरूरी है।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि दस्तावेजों की जांच सुप्रीम कोर्ट का कार्यक्षेत्र नहीं है। इसके लिए ट्रायल कोर्ट या कोई विशेष समिति उपयुक्त मंच हो सकती है। फिलहाल कोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई छह सप्ताह बाद तय की है और तब तक केंद्र सरकार को अपना जवाब दाखिल करना होगा।
यह मामला तब सामने आया जब सहारा इंडिया कमर्शियल कॉरपोरेशन लिमिटेड ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर अपनी 88 संपत्तियों को अदाणी प्रॉपर्टीज प्राइवेट लिमिटेड को बेचने की अनुमति मांगी थी। कोर्ट ने पहले ही 14 अक्टूबर को इस याचिका पर केंद्र, सेबी और अन्य हितधारकों से जवाब मांगा था।
अब सभी की नजर इस बात पर है कि क्या अदाणी ग्रुप को सहारा की संपत्तियां मिलेंगी और क्या इससे निवेशकों को उनका रिफंड मिल सकेगा।

