भारत का ई-कॉमर्स सेक्टर पिछले एक दशक में तेजी से बदला है। फ्लिपकार्ट और अमेजन जैसे बड़े प्लेटफॉर्म पहले से मौजूद थे, लेकिन छोटे दुकानदारों, गृहिणियों और टियर-2 व टियर-3 शहरों के लोगों के लिए ऑनलाइन बिजनेस शुरू करना आसान नहीं था। इसी अंतर को भरने के लिए दो युवाओं ने अपनी मोटी सैलरी वाली जापान की नौकरी छोड़ भारत लौटने का फैसला किया। उनका नाम है विदित आत्रे और संजीव बर्नवाल। इन दोनों ने 2015 में जिस सपने की शुरुआत की थी, वह आज मीशो (Meesho) के रूप में 50,000 करोड़ रुपये का प्लेटफॉर्म बन चुका है।
मीशो की शुरुआत
विदित और संजीव दोनों ही IIT दिल्ली के छात्र रहे हैं। पढ़ाई पूरी करने के बाद दोनों ने जापान में आकर्षक नौकरियां हासिल कीं। संजीव बर्नवाल ने सोनी कॉर्पोरेशन और सोनी मोबाइल कम्युनिकेशंस में काम किया, जहां वे एंड्रॉइड कैमरा हार्डवेयर एब्स्ट्रैक्शन लेयर डिजाइनर और डेवलपर थे। वहीं विदित आत्रे ने इनमोबी और आईटीसी लिमिटेड जैसी कंपनियों में काम किया।
लेकिन दोनों के मन में कुछ अपना करने की इच्छा थी। 2015 में उन्होंने नौकरी छोड़ दी और बेंगलुरु के कोरमंगला में एक छोटे से फ्लैट में मीशो की नींव रखी। उनका आइडिया बेहद सरल था – “हर किसी को अपना ऑनलाइन बिजनेस शुरू करने का मौका मिलना चाहिए, बिना एक रुपया लगाए।”
छोटे दुकानदारों और महिलाओं के लिए प्लेटफॉर्म
मीशो का लक्ष्य था छोटे दुकानदारों और गृहिणियों को ऑनलाइन बिजनेस का मौका देना। फ्लिपकार्ट और अमेजन जैसे प्लेटफॉर्म पर बड़े ब्रांड्स और कंपनियों का दबदबा था, लेकिन छोटे विक्रेताओं के लिए वहां जगह बनाना मुश्किल था।
मीशो ने इस समस्या का हल निकाला। यहां किसी को गोदाम रखने, इन्वेंट्री मैनेज करने या शिपिंग की चिंता नहीं करनी पड़ती। बस प्रोडक्ट चुनिए, उसे व्हाट्सएप, फेसबुक या इंस्टाग्राम पर शेयर कीजिए। ऑर्डर आने पर मीशो डिलीवरी कर देता है और पैसा सीधे आपके खाते में पहुंच जाता है।
इस मॉडल ने खास तौर पर महिलाओं को सशक्त बनाया। आज मीशो पर 1.5 करोड़ से ज्यादा रीसेलर्स हैं, जिनमें से 80% महिलाएं हैं। इनमें गृहिणियां, छोटे शहरों और गांवों की महिलाएं शामिल हैं, जिन्होंने मीशो के जरिए अपनी आजीविका बनाई है।
सोशल कॉमर्स की क्रांति
मीशो ने पारंपरिक ई-कॉमर्स को बदलकर सोशल कॉमर्स की शुरुआत की। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के जरिए प्रोडक्ट बेचने का यह मॉडल भारत में पहली बार बड़े पैमाने पर सफल हुआ।
- मीशो ने 5,00,000 से ज्यादा सक्रिय विक्रेताओं को जोड़ा।
- वित्त वर्ष 2025 में 19.9 करोड़ वार्षिक लेन-देन करने वाले उपयोगकर्ताओं से 1.8 अरब ऑर्डर पूरे किए गए।
- कंपनी का नेट मर्चेंडाइज वैल्यू (NMV) वित्त वर्ष 2025 में 29% बढ़कर 29,988 करोड़ रुपये हो गया।
IPO और वैल्यूएशन
मीशो अब अपना IPO ला रही है। कंपनी ने प्राइस बैंड 105-111 रुपये प्रति शेयर तय किया है। अपर बैंड पर प्लेटफॉर्म का वैल्यूएशन लगभग 50,095.75 करोड़ रुपये हो गया है। यह दिखाता है कि एक छोटे से आइडिया से शुरू हुई कंपनी आज भारत के ई-कॉमर्स सेक्टर में बड़ी ताकत बन चुकी है।
घाटे की चुनौती
हालांकि मीशो की यात्रा आसान नहीं रही। कंपनी ने अपनी स्थापना के बाद से लगातार घाटा दर्ज किया है।
- वित्त वर्ष 2025 में मीशो ने 3,942 करोड़ रुपये का घाटा दर्ज किया।
- यह घाटा मुख्य रूप से रिवर्स फ्लिप टैक्स और सार्वजनिक ढांचे में परिवर्तन से जुड़ी लागतों के कारण हुआ।
- कंपनी का परिचालन नकदी प्रवाह नकारात्मक रहा है, क्योंकि उसने मार्केटिंग, टेक्नोलॉजी और मानव संसाधन पर बड़े पैमाने पर निवेश किया है।
लेकिन इसके बावजूद मीशो का यूजर बेस और विक्रेता नेटवर्क लगातार बढ़ रहा है, जो भविष्य में इसे लाभदायक बना सकता है।
संस्थापकों की कहानी
संजीव बर्नवाल – मीशो के सह-संस्थापक और CTO। IIT दिल्ली से पढ़ाई के बाद उन्होंने जापान में सोनी कॉर्पोरेशन के साथ काम किया। लेकिन मन में कुछ नया करने की इच्छा उन्हें भारत वापस ले आई।
विदित आत्रे – मीशो के सह-संस्थापक और CEO। उन्होंने इनमोबी और आईटीसी लिमिटेड में काम किया। मीशो की रणनीति और विकास में उनकी अहम भूमिका रही।
विदित आत्रे को कई बड़े सम्मान भी मिले हैं:
- फॉर्च्यून 40 अंडर 40 (2021)
- फास्ट कंपनी की वर्ल्ड्स 50 मोस्ट इनोवेटिव कंपनीज़ (2020)
- फोर्ब्स 30 अंडर 30 एशिया और इंडिया (2018)
आज का मीशो
मीशो आज सिर्फ एक ऐप नहीं है, बल्कि लाखों भारतीयों की आजीविका का जरिया है। छोटे दुकानदारों से लेकर गृहिणियों तक, हर किसी को इसने ऑनलाइन बिजनेस का मौका दिया है।
कंपनी में आज 1,001-5,000 कर्मचारी काम करते हैं। यह भारत के सोशल कॉमर्स सेक्टर का पर्याय बन चुकी है और आने वाले समय में इसके और भी विस्तार की संभावना है।
निष्कर्ष
Meesho Success Story हमें यह सिखाती है कि बड़ा बिजनेस बनाने के लिए जरूरी नहीं कि आपके पास भारी पूंजी हो। सही आइडिया, मेहनत और लोगों की जरूरतों को समझने की क्षमता ही सफलता की कुंजी है।
विदित आत्रे और संजीव बर्नवाल ने जापान की मोटी सैलरी वाली नौकरी छोड़ भारत लौटकर यह साबित कर दिया कि अगर आप अपने देश के लोगों की समस्याओं को हल करने का संकल्प लें, तो उससे न सिर्फ बिजनेस खड़ा होता है बल्कि लाखों लोगों की जिंदगी भी बदल सकती है।

