भारत का व्यापारिक इतिहास कई ऐसी कहानियों से भरा है, जिनमें कुछ परिवारों ने अपनी संपत्ति और प्रभाव से पूरे साम्राज्य की दिशा बदल दी। ऐसी ही एक कहानी है जगत सेठ परिवार की, जो 18वीं शताब्दी में भारत का सबसे धनी व्यापारी घराना माना जाता था। उनकी दौलत इतनी अधिक थी कि उस समय के Bank of England से भी ज्यादा आंकी जाती थी। मुगल बादशाहों से लेकर ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी तक, सभी ने इस परिवार से कर्ज लिया और उनकी आर्थिक ताकत को स्वीकार किया।
जगत सेठ कौन थे?
जगत सेठ परिवार की जड़ें पटना के व्यापारी माणिक चंद से जुड़ी हैं। 1700 के शुरुआती दशक में वे व्यापार करने के लिए ढाका आए और बाद में बंगाल की राजधानी मुर्शिदाबाद चले गए। वहां वे नवाब के निजी बैंकर और वित्तीय सलाहकार बने। 1712 में दिल्ली के बादशाह फर्रुखसियर ने उन्हें “नागर सेठ” की उपाधि दी।
माणिक चंद की मृत्यु के बाद उनके भतीजे और दत्तक पुत्र फतेह चंद ने कारोबार संभाला। फतेह चंद को ही “जगत सेठ” यानी “विश्व का सेठ” कहा गया। उनके नेतृत्व में यह परिवार इतना शक्तिशाली हो गया कि मुगलों से लेकर अंग्रेजों तक सभी उनकी आर्थिक ताकत पर निर्भर हो गए।
बैंकिंग साम्राज्य
जगत सेठ परिवार का कारोबार सिर्फ साहूकारी तक सीमित नहीं था।
- वे बंगाल सरकार के लिए राजस्व वसूलते थे।
- सरकारी खजाने की देखरेख करते थे।
- सिक्के ढालते थे और विदेशी मुद्रा का लेन-देन करते थे।
ब्रिटिश इतिहासकार रॉबर्ट ओर्मे ने लिखा है कि मुगल साम्राज्य में यह हिंदू व्यापारी परिवार सबसे धनी था और मुर्शिदाबाद की सरकार पर इसका जबरदस्त प्रभाव था।
कुछ विवरणों के अनुसार, 1720 के दशक में जगत सेठों की नकद राशि इंग्लैंड के सभी बैंकों को मिलाकर उससे भी अधिक थी। आज के मूल्य में उनकी संपत्ति लगभग 1 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर (₹8.3 लाख करोड़) आंकी जाती है।
राजनीतिक प्रभाव और प्लासी का युद्ध
फतेह चंद के बाद 1744 में उनका पोता महताब चंद गद्दी पर बैठा। महताब चंद और उनके चचेरे भाई महाराजा स्वरूप चंद का अलीवर्दी खान के समय बहुत दबदबा था।
लेकिन जब सिराजुद्दौला नवाब बने, तो जगत सेठों ने अंग्रेजों के साथ मिलकर उसके खिलाफ साजिश रची। इसी साजिश का परिणाम था 1757 का प्लासी का युद्ध, जिसके बाद बंगाल पर ब्रिटिश कब्जा हो गया।
इस घटना ने भारत के इतिहास की दिशा बदल दी। हालांकि अंग्रेजों के साथ मिलीभगत ने जगत सेठों की प्रतिष्ठा को भी नुकसान पहुंचाया।
पतन की शुरुआत
प्लासी के युद्ध के बाद जगत सेठों ने अपनी अधिकांश जमीनें खो दीं। ईस्ट इंडिया कंपनी ने उनसे लिया गया भारी-भरकम कर्ज कभी लौटाया ही नहीं।
1857 के विद्रोह ने इस परिवार को अंतिम झटका दिया। धीरे-धीरे उनकी आर्थिक ताकत खत्म हो गई और वे सार्वजनिक जीवन से गायब हो गए।
आज कहां हैं वंशज?
1900 के बाद जगत सेठ परिवार का नाम इतिहास के पन्नों में ही रह गया। उनके वंशज आज कहां हैं, इस बारे में कोई ठोस जानकारी नहीं है।
मुर्शिदाबाद में हजादुआरी पैलेस से थोड़ी दूरी पर जगत सेठ का भव्य महल आज भी मौजूद है। यह अब एक संग्रहालय बन चुका है, जहां उस अतुलनीय वैभव की बस कुछ झलकियां शेष हैं।
निष्कर्ष
Indian Business History में जगत सेठ परिवार का नाम हमेशा याद किया जाएगा। यह वह परिवार था जिसने मुगलों को कर्ज दिया, अंग्रेजों को उधार दिया और जिसकी संपत्ति ब्रिटेन के बैंक से भी ज्यादा थी।
आज उनकी कहानी हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि जो परिवार कभी दुनिया का सबसे बड़ा बैंकर था, वह इतिहास के उतार-चढ़ाव में कैसे गुम हो गया।

