भारतीय रुपये (Indian Rupee) में शुक्रवार को भारी गिरावट देखने को मिली। डॉलर के मुकाबले रुपया 89.34 के रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच गया। यह अब तक का सबसे कमजोर स्तर है, जिसने बाजार और निवेशकों की चिंता बढ़ा दी है।
गिरावट की वजह
विशेषज्ञों का कहना है कि अमेरिकी डॉलर की बढ़ती मांग और विदेशी निवेशकों की बिकवाली ने रुपये पर दबाव बढ़ा दिया है। हाल ही में अमेरिकी फेडरल रिजर्व द्वारा ब्याज दरों में कटौती की उम्मीद कम हो गई है, जिससे डॉलर मजबूत बना हुआ है। इसके अलावा, India-US Trade Deal में देरी और अमेरिकी टैरिफ ने भी रुपये की कमजोरी को और गहरा किया है।
विदेशी निवेशकों का रुख
इस साल विदेशी निवेशकों ने भारतीय इक्विटी से लगभग $16.5 बिलियन निकाल लिए हैं। यही वजह है कि रुपया एशिया की सबसे कमजोर करेंसी में से एक बन गया है। ट्रेडर्स का कहना है कि रिजर्व बैंक ने पहले 88.80 के स्तर पर हस्तक्षेप किया था, लेकिन अब दखल कम होता दिख रहा है। इससे करेंसी पर दबाव और बढ़ गया है।
असर आम लोगों पर
रुपये की गिरावट का सीधा असर आयात पर पड़ता है। कच्चे तेल, इलेक्ट्रॉनिक्स और अन्य आयातित सामान महंगे हो सकते हैं। इससे महंगाई बढ़ने की आशंका है। वहीं, निर्यातकों को कुछ राहत मिल सकती है क्योंकि कमजोर रुपया उनके उत्पादों को अंतरराष्ट्रीय बाजार में प्रतिस्पर्धी बनाता है।
आगे क्या?
सरकार और रिजर्व बैंक स्थिति पर नजर बनाए हुए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर डॉलर की मजबूती जारी रही और विदेशी निवेश का बहाव बाहर जाता रहा, तो रुपया और दबाव में आ सकता है।

