गुजरात के कच्छ में अदाणी ग्रुप का कॉपर स्मेल्टर (Adani Copper Plant) इस समय अयस्क की कमी से जूझ रहा है। जून 2025 में प्रोसेसिंग शुरू करने वाली कच्छ कॉपर लिमिटेड को अपनी पूरी क्षमता से उत्पादन करने के लिए जितना कच्चा माल चाहिए, उसका दसवां हिस्सा भी नहीं मिल पा रहा है। इससे प्लांट की शुरुआत धीमी हो गई है और भारत की कॉपर उत्पादन में आत्मनिर्भरता की कोशिशों पर सवाल उठने लगे हैं।
कितनी है कमी?
कस्टम डेटा के अनुसार, अक्टूबर 2025 तक कंपनी ने लगभग 1.47 लाख टन कॉपर कंसन्ट्रेट आयात किया है। जबकि प्लांट को सालाना 5 लाख टन उत्पादन के लिए करीब 16 लाख टन कंसन्ट्रेट की जरूरत होती है। तुलना करें तो हिंडाल्को इंडस्ट्रीज ने इसी अवधि में 10 लाख टन से ज्यादा अयस्क खरीदा है।
सप्लाई क्यों घट रही है?
- वैश्विक स्तर पर माइनिंग में रुकावटें आई हैं।
- फ्रीपोर्ट-मैकमोरन, हडबे मिनरल्स और चिली की सरकारी कंपनी कोडेल्को जैसे बड़े प्रोड्यूसर का उत्पादन प्रभावित हुआ है।
- चीन ने अपनी स्मेल्टिंग क्षमता तेजी से बढ़ाई है, जिससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में सप्लाई दबाव में आ गई है।
- ट्रीटमेंट और रिफाइनिंग चार्ज (TRC) भी रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच गए हैं, जिससे स्मेल्टर्स को कम मार्जिन पर काम करना पड़ रहा है।
नई कंपनियों पर असर
कच्छ कॉपर जैसी नई कंपनियों के लिए यह स्थिति और चुनौतीपूर्ण है। सप्लाई की कमी का मतलब है कि फैसिलिटी को चलाने में ज्यादा खर्च आएगा और उत्पादन क्षमता बढ़ाने की प्रक्रिया में समय लगेगा। कंपनी ने अगले चार साल में अपनी क्षमता को दोगुना कर 10 लाख टन करने का लक्ष्य रखा है, लेकिन मौजूदा हालात इसे मुश्किल बना रहे हैं।
भारत की आत्मनिर्भरता पर असर
कॉपर की मांग इंफ्रास्ट्रक्चर, पावर और कंस्ट्रक्शन सेक्टर से लगातार बढ़ रही है। घरेलू अयस्क रिजर्व सीमित हैं और प्रोसेसिंग क्षमता भी पर्याप्त नहीं है। ऐसे में कच्छ कॉपर की धीमी शुरुआत यह संकेत देती है कि भारत को मेटल्स में आत्मनिर्भर बनने के लिए अभी लंबा रास्ता तय करना होगा।

